Friday, March 20, 2026

छंद सरिता

 


अनुराधा चौहान'सुधी'


1.


रमेश छंद  


122 222


122 122 22


जपो श्री राधा राधा,रुलाए न कोई बाधा।

मिटाती कष्टों को, हमारी किशोरी राधा॥


2.


सुशीला छंद 


122 222


122 212 22


विदा होती देखो,हमारी लाडली बेटी।

छुपाए आँसू वो,चली ले याद की पेटी॥


3.


लक्ष्य छंद 


122 222


122 221 22

 

लली थी छोटी सी,बनी देखो आज रानी।

सजाए चूड़ी वो,सजी मेहंदी सुहानी॥




4.


सुमित छंद 

122 222


122 222 12


बता दो वो बातें,छुपाए बैठे जो अभी।

चले जाएंगे तो,मिलेंगे जाने फिर कभी॥



5.


ध्रुव छंद 


122 222


122 222 21


घटा छाई काली,भिगोए वृक्षों के चीर।

धरा हर्षाती है,भरे नैनों में नीर॥


6.


दीक्षा छंद 


122 222


212 212 22


डराता अंधेरा,डोलती आस है सारी।

डराती जोरों से, कौंधती चंचला भारी॥


7.

प्रभात छंद 


122 222


221 221 22


झुके नैना बोलें,कोई नया गीत गाओ।

वहाँ क्यों बैठे हो, दूरी जरा सी घटाओ॥


8.


उज्ज्वला छंद 


122 222

212 222 12


लिए पीड़ा भारी,जानकी लंका में खड़ी।

नहीं आए स्वामी,घोर चिंता में पड़ी॥


9.


कृत्तिका छंद 

 

122 222


212 222 21


नदी की धारा में,डोलती जाती ज्यों नाव।

विचारों की नैया, छेड़ती है सूखे घाव।



10.


आस छंद 

122 222


221 212 22


सुनी तेरी वंशी,झूमे मयूर गोपाला।

नचाए वो देखो ,ले संग गोपियां ग्वाला॥


11.


दिनकर छंद 


122 222


221 221 22

बसाए प्राणों में, राधा बनी मैं पुजारी।

किशोरी जी बोलो, है क्या कमी हमारी॥


12.

नलिन छंद


122 222


221 222 12

 

कन्हैया वंशी की,छेड़े सुरीली रागिनी।

रिझाता है देखो,बैठा सखाओं संगिनी॥



13.


सुमा छंद 


122 222


221 222 21


अनेकों यादों का,संध्या चली ले अंबार।

निशा फैला बांहें,तारों भरा लाई हार॥



14.


सपना छंद 


122 222


222 122 21


रखे जो मर्यादा,ले माता पिता से ज्ञान।

वही पाए मोती,मेधावी बने संतान 



15.


सुवासिता छंद  


122 222


222 122 12

कुहासे की ओढ़ा,जाड़े ने दुशाला अभी।

झुकाए डाली को, खेलीं ओस बूँदे तभी॥


16.

गुल छंद 


122 222


222 212 12

सुना वंशी कान्हा,खो जाते हो बता कहाँ ।

सखी रोती ढूँढें,राधा रूठी खड़ी जहाँ॥


17.


प्रांजलि छंद 


122 222,222 212 21

रिझाती वर्षा की,बूँदे है नाचती   जोर।

सुहानी हो जाती, रैना संध्या खिली भोर॥




18.

वीणा छंद 


122 222,222 221 12

सुने माँ भक्तों का,दुःखों से भारी दुखड़ा।

लुभाता है देखो,माता रानी का मुखड़ा॥


19.


विधा छंद 


212 222,122 122 22

मोह माया संगी,गिरा वासना की खाई।

श्याम में डूबा जो,उसी ने खुशी है पाई॥


20.


गोपी छंद 

212 222,122 212 22

दास हूँ मैं तेरा,बसालो नाथ सीने में।

नंदलाला मेरे,मजा आता न जीने में॥


21.


धरा छंद 


212 222,122 221 22

लाडली बेटी की,सजी है डोली निराली।

देखते हैं रोते,पिता माता आज खाली॥



22.


निरंतर छंद 


212 222,122 222 12

कार्तिक की रैना,सजी है दीपावली।

दीप की श्रेणी से, फैला है उजाला गली॥


23.


ऋचा छंद 



212 222,122 222 21

कामना को पीछे,दिखावे की पाले होड़।

छोड़ सीधे रास्ते,चले टेढ़े-मेढ़े मोड़॥


24.


मनीषी छंद  


212 222,212 212 22

लालची लोगों ही,छीनते दीन की रोटी।

मोह-माया पाले, चेतना हो गई मोटी॥


25.


रीत छंद  


212 222,221 221 22

चाँद को रैना में,बैठी चकोरी निहारे।

हैं सजाए देखो,आकाश ने लाख तारे॥



26.


प्रज्ञ छंद 


212 222,212 222 12

श्याम को पाना है, नित्य राधा राधा कहो।

नाम की लीला से, प्रेम की धारा में बहो॥


27.


आख्या छंद 


212 222,212 222 21

झूमती है रैना,चाँदनी की आभा देख।

अंगना चंदा के, है लिखा तारों ने लेख॥


28.


यथार्थ छंद 


212 222,221 212 22


हो रहा अंधेरा,दीपों रखे सभी खाली।

झोपड़ी अंधेरी, दीपावली रही काली।


29.


बोध छंद 


212 222,221 221 22

गोपियों के लागे,सलोने बांके बिहारी।

देख लीला रीझें,राधा सखी आज सारी॥


30.


दीप्ति छंद 


212 222,221 222 12

नित्य टूटे रिश्ते,संस्कार सूली पे चढ़े।

लालसा को पाले,ढोंगी बहाने ही गढ़े।


31.दिव्य छंद 


212 222,221 222 21

बेटियाँ होती है,माता पिता का सम्मान।

लाडली भाई की,आवास की होती शान॥


32.विद्योत्तमा छंद 


212 222,222 122 21


काल की तेजी ही,आयु को घटाती नित्य।

लालसा छोड़ो जी,थामो धर्म वाले कृत्य॥



33.विद्या छंद 


212 222,222 122 12


जीत ठानी होगी,तो कोई हरा ना सके।

हानि की आशंका,जो पाले सदा ही थके॥


*34.शर्वरी छंद*

212 222,222 212 12


लाड़ली श्री राधा,प्राणों में श्याम के बसी।

प्रीत की ये डोरी,राधा ने हाथ में कसी॥


 *35. अनंत छंद*

212 222,222 212 21


थाम लो हाथों को,जीना है प्रीत के साथ।

सोचते बैठोगे, तो छूटेगा सदा हाथ॥



 *36. सुज्ञ छंद*

212 222,222 221 12


चाँद की आभा के,हर्षित होती नित्य धरा।

रैन की बाहों में,तारों ने आकाश भरा॥ 


 *37. विज्ञ छंद* 

221  222,122 122 22


लेना नहीं आहें,कभी दीन दुःखी मानो।

बर्बाद हो जाते,दिया श्राप सच्चा जानो॥



38.विज्ञातात्मा छंद 


221 222,122 212 22


सच्चे होते हैं जो,उन्हें माता बुलाती है।

दे दर्श भक्तों को,खुशी झूला झुलाती है॥

   


39अचला छंद

221 222,122 221 22


अच्छे बहाने से,सुने ताने आज मैंने।

रोना नहीं आया,सभी आए दोष देने॥


40.व्याघ्र छंद


221 222,122 222 12


वाणी रखो मीठी,बुराई पीछे छोड़ दो।

जी पे लगे ताले,चलो आओ तोड़ दो॥



41.मेधा छंद 


221 222,122 222 21


आराम के पीछे,बिगाड़े हैं कर्मा लोग।

बैठे हुए चाहें, सभी राजा जैसे भोग॥




42.विदुषी छंद 


221 222,212 212 22

श्रीराम सीता को,देखते रो पड़े नैना।

माँ को नहीं आए,राम सीता बिना चैना॥




43. *विदिता छंद*


221 222,221 221 22


विद्या तुम्हे पाना,हो कर्म भी सत्य तेरे।

पूरी करें आशा,संतोष देते सबेरे॥



44. *विपुला छंद* 

 

221 222,212 222 12


चाहे जिसे राधा,वो कन्हैया है साँवला॥

लीला रचाए जो,वो यशोदा का लाडला।



45. *वृंदा छंद*

 

221 222,212 222 21


आवेग को छोड़ो,लालसा की गाँठें खोल।

आनंद आएगा,नित्य राधा रानी बोल॥



46. *विधायनी छंद* 


221 222,221 212 22

जाने बिना बातें,ऐंठे हुए सभी कैसे।

दुर्भावना पाले,रिश्ते मिटा रहे जैसे।



47. *साँची छंद* 

221 222,221 221 22


डिब्बे सभी खाली,क्या बालकों को खिलाते।

पीड़ा छुपा ली तो,आँसू छुपाए न जाते।



48. *स्निग्धा छंद* 

221 222,221 222 12

माला लिए बैठी,कान्हा तुम्हारे सामने।

रूठे हुए हो क्यों,आते नहीं क्यों थामने॥



49. *विद्यांशी छंद* 

221 222,221 222 21


ले नाम राधा का,ज्ञानी बनें साधू संत।

पापी मिले माटी,कर्मा बने साथी अंत।


50. *इंदुप्रभा छंद* 

221 222,222 122 21


संस्कार को सोना,माया मोह बैरी जान।

आक्रोश को त्यागो,दो माता पिता को मान॥



51. *विमला छंद* 

221 222,222 122 12


संस्कार हों अच्छे,तो संसार भी जानता।

गंदे विचारों को,तो कोई नहीं मानता॥



52. *विन्देश्वरी छंद* 

53. 

221 222,222 212 12


डूबे हुए प्राणी,आकांक्षा की नदी यहाँ।

माया बनी फंदा,भागेगा भी अभी कहाँ॥



*53. कृतिशिखा छंद*


221 222,222 212 21


टूटे लिए रिश्ते,अंधेरे को रहे भोग।

संवेदना झूठी,एकाकी हो रहे लोग॥


 *54. उर्वशी छंद*


222 122,122 122 22

त्यागो आलस्य को,भलाई इसी में होगी।

काया क्षीण हो तो, बनोगे जरा में रोगी॥




 *55. प्रज्ञा छंद*


222 122,122 212 22


माया नाथ तेरी,यहाँ कोई नहीं जाने।

जाने नाथ वोही,प्रभो जो आपको माने॥



 *56.शिल्पशिखा छंद* 

222 122,122 221 22


मेरे शंभु बाबा,गले में डाले भुजंगा।

नंदी साथ बैठे, चलें बिच्छू भूत संगा॥


 *57. यशस्वी छंद* 

222 122,122 222 12


पूछें गोपियों से,सखा की वंशी ले रखी।

रूठे श्याम मेरे,मनाऊँ कैसे मैं सखी॥


 58. *काव्यशिखा छंद* 


222 122,122 222 21

बोले ये पपीहा,घने मेघा छाए जोर।

हर्षित वृक्ष डाली,धरा झूमे नाचे मोर॥



59. *रत्नप्रभा छंद* 


222 122,212 212 22


बेटा चाँद तारा,लाड़ सारा वही पाता।

बेटी बोझ मानो,रीत कैसी बुरी माता॥



60. *रत्नावली छंद*


222 122,221 221 22


पासे कौरवों के,माया चले दुष्ट मामा।

हारी द्रोपदी भी,तो श्याम ने हाथ थामा!॥



61.रिद्धिमा छंद 


222 122,212 222 12


भोली माँ यशोदा,देख खाई माटी कहाँ।

ग्वाले झूठ बोलें,गोपियाँ भी झूठी यहाँ।



62.सुधी छंद 


222 122,212 222 21


तोड़े रीत बेटी,तो सजा देता संसार।

बेटे तोड़ते तो,नाम दे देते हैं प्यार॥



63.अर्णव छंद 


222 122,221 212 22


आओ राम मेरे,रो के बुला रही सीते।

जीतो नाथ लंका,कैसे दिवा यहाँ बीते॥


64.नव्या छंद 


222 122,221 221 22


साया माँ पिता का,होता सदा ही जरूरी।

रक्षक वो हमारे,इच्छा करें नित्य पूरी॥




65.प्रारम्भिक छंद 


222 122,221 222 12


माता पिता चाहें,संतान का अच्छा सदा।

होता तो वही है,जो भाग्य में होता बदा॥


 

66. विख्यात छंद 


222 122,221 222 21


काली रात बीती,ले रोशनी आई भोर।

छोड़ो आलस्य को,जागो करें पंछी शोर॥



67.स्वस्तिक छंद 


222 122,222 122 21


कैसा ये दिखावा, लज्जा त्याग बैठे लोग।

आँखें मूँद भोगें,देखो वासना के भोग॥



68.विद्यांश छंद 


222 122,222 122 12


सीने में छुपाए, यादें साथ लेती चली।

बेटी छोड़ जाती, पीछे मायके की गली॥


69.विज्ञांश छंद 


222 122,222 212 12


माता की दुलारी, वैदेही लाड़ से पली।

हो के राजरानी,काँटो के पंथ पे चली॥


70.निष्णात छंद

 

222 122,222 212 21


सीता राम बोलो,पीड़ा सारी हरें राम।

कष्टों को मिटाएं,लेलो माला जपो नाम॥


71.कोविद छंद 


222 212,122 122 22


संबंधों को ठसे,आरोप लगाती बातें।

छाई हो लालिमा, नहीं भूलती वो रातें॥


72. विज्ञांशी छंद

 

222 212,122 212 22


काँटो सी पीर दे,पिता माँ छोड़ के जाना।

नारी के त्याग को,कभी कोई नहीं माना॥


73.जागृति छंद


222 212,122 221 22


सीने लेती छुपा,विदाई की पीर भारी।

रिश्तों को बाँधते,बिता देती आयु नारी।



74.मयंक छंद 


222 212,122 222 12


बैठे कैलाश पे,भभूती को काया मले।

सर्पों के हार को,शिवा ने डाला है गले॥



75.चेतन छंद 


222 212,122 222 21


माया के खेल में,लगा है सारा संसार।

माया जैसे मिटे,बुढ़ापे से जाए हार॥


76.भुवि छंद 


222 212,212 212 22


आई दीपावली,दीप की लौ जले द्वारे।

माता श्री लक्ष्मी,पूजते हैं यहाँ सारे॥


77.लावण्य छंद 


222 212,221 221 22.


बाबा की लाडली,बेटी चली बैठ डोली।

सूना है मायका,सूनी हुई मात झोली॥


78.सारांश छंद 


222 212,212 222 12


सच्ची हो कामना,झोलियाँ दुर्गा माँ भरे।

काली सी रात का,दूर अंधेरा भी करे॥



79.अग्रिमा छंद 


222 212,212 222 21


देते क्यों लाड़ में,लाड़लो को अंधी छूट।

रोते माता पिता,वो करें दारू पी लूट॥


80.सुगंध छंद 


222 212,221 212 22


पेड़ों को काट के,है वाटिका मिटा डाली।

पाषाणों से सजा,संसार ये लगे खाली‍॥



81.प्रेम छंद

  

222 212,221 221 22


रिश्तों की ओट में,देखा दिखावा वहाँ पर।

मैं हूँ ज्यादा धनी,है प्रीत ऐसी यहाँ पर॥



82. विराट छंद

    

 222 212 ,221 222 12


गोपी बातें करे,क्यों बावली राधा लगे।

अंधेरी रैन में,वो याद में बैठी जगे॥


 83.शाश्वत छंद


222 212,,221 222 21


जीने के अंत को,संसार में होते देख।

यात्रा ही सत्य है,मानो विधाता का लेख।


84. स्वयं छंद

 222 212,,222 122 21


भागेगा सत्य से,तो कैसे मिलेगी जीत।

पाने का संघर्ष,ही है यहाँ की रीत॥


85. आर्यन छंद

222 212,222 122 12


मेघों के शोर हो,तो पी पी पपीहा करे।

पानी की बूँद को,बैठा चोंच में वो भरे॥



86. राधेगोपाल छंद

222 212,222 212 12


आई पीली धूप, जाड़े का कोहरा हटा।

पेड़ों की डाल पे,फूलों की है खिली छटा॥


87. वीरेंद्र छंद


222 212, 222 212 21


देना है दो वही,जो लौटे तो मिले हर्ष।

जाए वो दूर तो,बीती रातें लगे वर्ष॥


88. हरियाणा छंद


222 212,222 221 12


रोती है द्रोपदी,कान्हा मेरी लाज बचा।

धोखा दे कौरवों,ने कैसा प्रपंच रचा॥




89. *निर्भीक छंद*


222 221,122 122 22.


गोपी ग्वाले साथ,मुरारी बजाय बंशी।

राधा झूमे संग,प्रभो के सभी हैं अंशी॥



90. *सगुणा छंद* 

 

222 221,122 212 22


सर्दी आई जोर,घरों में ठंड से ऐंठे।

काँपे बूढ़े हाड़,अंगीठी तापते बैठे॥


91. विपिन छंद 

 

222 221,122 221 22.


भेदी देता भेद,मिटानें को चैन सारा।

ऐसे प्राणी दुष्ट,रखो ऐसो से किनारा॥


92. वियोना छंद 


222 221,122 222 12 


कैसे माया पाँव,सभी के बेड़ी डालती।

पाले अंतः डाह,विषैली बातें पालती॥


93. विविता छंद


222 221,122 222 21


दंभी हैं जो लोग,दिखाते वो लोभी रूप।

ज्ञानी होते मौन,स्वभावी होते वो भूप॥



94. विविक्ता छंद


222 221,212 212 22


छोटे होते वंश,प्रीत भी तो घटे वैसे।

रिश्ते नाते आज,छूटते जा रहे कैसे।


95. भरत छंद


222 221,221 221 22


अच्छी हो संतान,माँ बाप को मान देते।

खोटे हो संस्कार,तो चैन भी छीन लेते॥


96. विषिमा छंद


222 221,212 222 12


मीठी बातें करें,पीठ पीछे ताने कसे।

झूठे होते लोग,नाग सा जैसा वो डसे॥


97. क्षिर्जा छंद


 222 221,212 222 21


सच्चाई आधार,जो बनाए वो है वीर।

जीतोगे संसार,जो कभी छोड़ा ना धीर॥



98. स्नेहा छंद


222 221,221 212 22


ताने देते पीर,भूलो कठोर बातों को।

होंठों पे मुस्कान,सींचो सदैव नातों को 


99. स्नेहिल छंद 


222 221,221 221 22


अच्छी बातें भूल,ऐसे बनें लोग राजा।

चोरी डाका लूट,हैं सीखते सीख ताजा॥


100. संस्कृति छंद


222 221,221 222 12


कैसा है संसार,पैसा बना राजा यहाँ।

भूखे बैठे दीन,देता दिखाई ये कहाँ॥



101. भारत छंद


222 221,221 222 21


छोड़ो साथी संग,आता नहीं कोई नाम।

लेता जो श्री नाम,जाए वही राधा धाम॥



102. अजिर छंद


222 221,222 122 21


सीमा पे तैनात, सेवा में हमारे वीर।

सर्दी गर्मी धूप, जाड़े में रखें हैं धीर॥


103. गुनिता छंद


 222 221,222 122 12


सोता नन्हा बाल,माता देख होती सुखी।

थोड़ा भी हो कष्ट,रोता देख होती दुखी॥


104. हर्षिता छंद

 

222 221,222 212 12


भोला भाला लाल,माँ की गोदी पले-बढ़े।

सीखे उत्तम सीख,वो भावी काल को गढ़े॥



105. नंदिनी छंद


222 221,222 212 21


आया कैसा काल,घी डालें आग संसार।

पीड़ा दे,दें ज्ञान,वो जाते भूल संस्कार॥


106. विप्सा छंद


222 221,222 221 12


ऐसे अद्भुत छंद,मैंने राधा नाम लिखे।

राधा के आशीष, छंदों का संसार दिखे॥


उपजाति सवैया 


*1 विज्ञ सवैया* 

मापनी:- सगण × ७ + गुरु + गुरु

सगण सगण सगण सगण,

सगण सगण सगण गुरु गुरु

११२  ११२  ११२  ११२,

११२   ११२  ११२   २  २ 


कड़वी अनुभूति मिले जग में,

उनसे डरके थक ना जाना।

सबसे डरके तुम क्यों छुपते,

कहते जग में मिलता ताना।

हँसते हँसते निकलो घर से,

हँसते हँसते घर को आना।

यह जीवन है कड़वी टिकिया,

श्रम से मन सा यश है पाना 


*2 विदुषी सवैया*✍️


मापनी..रगण×७+गुरु (22 वर्ण)

२१२ २१२ २१२ २,१२ २१२ २१२ २१२ २


आज है लाड़ली की विदाई,

बनाई प्रभो यह क्यों रीत भारी।

फूल सी वो पले गोद माँ के,

चली है पिता की गली छोड़ सारी।

बेटियों को यही सीख देते,

पराई सदा ही रहे देख नारी।

आँसुओं की बहे धार ऐसी, 

विधाता लिखे लेख से आज हारी।


*3 अर्णव सवैया*✍️

तगण राजभा × 5 तगण गुरु गुरु


221 212 212 212,

212 212 221 22


राधा कहो मिलें नाम से श्याम भी,

नाथ डूबे नहीं देदो सहारा।

माया मिटे हटे मोह बेड़ी कसी,

लोभ का छूटता जाए किनारा।

है अंत की शुरूआत ऐसा लगे,

नाथ देदो हमें कोई इशारा।

होगा ही भला काल आए नया,

हो उमंगो भरा आकाश सारा।

 


*4 सपना सवैया*

                  

मगण यगण × 6 मगण 

222 122 122 122, 122 122 122 222


फैली ये बुराई मिटे आज कैसे,

जले दीप आशा उजाला ही लाए।

अंधेरा घना राह बाधा बने ना,

मिले हार तो भी उमंगे न खोना।

संगी साथियों संग गोष्ठी सजेगी,

अकेले हुए तो नहीं रोना रोना।

आएगी नयी भोर ले के उजाले,

उठो जाग जाओ नहीं देखो सोना।



*5 विज्ञात सवैया*


212 221 221 222, 212 211 221 22

12,11 वर्ण पर यति


भोर की आभा खिली फूल मुस्काए,

अंधियारा अपना भार ढोता।

प्राणियों में साँस दे सूर्य ले आए,

जो उजाला सबकी प्रीत होता।

पंछियों का शोर गूंजे नींद भागे,

आलस्य में नर ही भाग्य खोता।

जोतता हैं खेत को भोर से देखो,

अन्नदाता हल ले बीज बोता।



*6 विधा सवैया*


 211 211 211 22, 221 121 121 122

23 वर्ण 11,12 वर्ण पर यति


छूकर जो चलती पुरवाई,

टूटे सपने फिर याद दिलाए।

मात पिता बिछड़े अब ऐसे,

आँसू बह के यह याद सताए।

घूम रहे क्षण रात दिवा वो,

जो नैहर में हँस बोल बिताए ।

जान लिया अब जीवन सच,

जाते क्षण लौट कहां फिर आए।




*7 राधेगोपाल सवैया* 


221 121 121 12,

1 121 121 121 122

24वर्ण 11,13 वर्ण पर यति


आधार सत्य जब भी रहता,

तब झूठ सदा सब को भड़काए।

होता भ्रमजाल कठोर सदा,

सबके मन ऊपर बोझ बढ़ाए।

चाहे जितना दिखता सच सा,

पर सत्य कभी छुपता न छुपाए।

होती यह बात सदैव सही,

रहना इसको सब भी अपनाए।



*8 प्रज्ञा सवैया* 


222 212 212 211,

212 212 211 22

23 वर्ण 12,11 पर यति


बोले मैया यशोदा रखो धीरज,

देख लाला यहीं आँगन सोता।

बातें झूठी करें गोपियों क्यों तुम,

लाल मेरा दुखी होकर रोता।

क्यों मेरे लाल से बैर लेते सब,

साँवरे से तुम्हें क्यों डर होता।

झूठी बातें बनाते सदा जीवन,

वो दुखी हो सदा धीरज खोता।



*9 विज्ञांश सवैया*


211 211 221 211, 

211 211 221 12

23 वर्ण 12,11पर यति


गीत सुनो खुशियों के जरा तुम,

गीत सदैव खुशी दें मन की।

प्रेम मिला रस घोलें सदा मन,

कष्ट मिटे थक बैठे तन की।

नित्य जरा भजनों को सुनो बस,

शांत करें यह शंका जन की।

राग मिटाकर पीते सभी फिर,

प्रीत सुधा मन के भावन की।



  

*10 सुधी सवैया*


121 121 121 112

121 121 122 12 

23 वर्ण 

12,11 पर यति 

पुरवा


सुनो पुरवा जब छूकर चली,

सुवास सुगंधित फैली यहाँ।

उड़े मन संग पतंग बनके,

उमंग हिलोर जगाती वहाँ। 

सुहावन सावन जोर करता,

सभी मन झूम रहे थे जहाँ।

बढ़े जब ताप अपार धरती,

सुगंध सुवासित होती कहाँ।


*11 सुज्ञ सवैया*


211 222 112 211,

211 222 11 22

22 वर्ण 12,10 पर यति


लेकर आशंका मन में मानव,

चैन मिटा कुंठा मन पाले।

पीकर के हाला विष जैसी,

नाग गले मायावश डाले।

रोग बनाया जीवन ऐसा, 

रोज गिरेंगे कीचड़ नाले।

जीवन अंधेरें कमरे घिरता।

देख घनेरे बादल काले।




12 *साँची सवैया* 


221 221 222 112, 221 221 22112

23 वर्ण (यति 12,11)


जोड़े खड़ी हाथ गोविंदा दर पे,

नैया लगे पार कैसे तन से।

काया सदा मोह की माया घिरती,

आके बचालो अंधेरे वनसे।

राधे मिले छाँव तेरे आँचल की,

छूटे सभी गाँठ मेरी मन से।

होगी कृपा प्रेम की तेरी मुझपे,

आनंद हो आज के जीवन से।


*13 बेरी सवैया*


221 122 211 211,

211 211 221 22

23 वर्ण 12,11पर यति


बाबा बम भोले हैं जग तारण,

दीन दुखी मन मिटाए।

लोटा जल पानी से खुश होकर,

ले वरदान सभी मोक्ष पाए।

गंगाधर नंदी संग चलें जब,

झूमत गावत लीला रचाए।

संसार संभाले शंकर सुंदर,

क्रोध हुआ जग देते जलाए।


*14 वीणा सवैया*


212 211 212 211, 

211 222 211 11

23 वर्ण, 12,11 पर यति 


साँवली सूरत मोहिनी मूरत,

मोह लिया कान्हा ने हर मन।

गोपियां भूल गईं सुधी मोहन,

रास रचाए देखो वो जोगन बन।

राधिका रोज उलाहना देकर,

आँसू भरे बैठी देख नयन।

संग गोपाल सखा लिए धावत,

पायल बाजे देखो छन-छन।




*15 सुवासिता सवैया*


212 112 122 121 1,

212 122 112 11

24 वर्ण , 13, 11 पर यति 


देश प्रेम भरे खड़े वीर सैनिक,

प्राण दे रहे नित्य धरा पर।

आन बान बना रहे मान जीवन,

शान से उठाएं अपना सर।

वीर धीरज से करें सामना जब,

थाम लें तिरंगा अपने कर।

धूल में अरि को मिलाते चले यह,

वीर की विदा नीर रहे झर,।


16

विज्ञात अचला सवैया 


विधान- २४ वर्ण प्रति चरण

चारों चरण समतुकांत हो, १३,११ पर यति हो।

भगण जगण जगण जगण लघु, भगण भगण भगण गुरु गुरु 

211 121 121 1211, 211 211 211 22


मोहन लिए मुरली यमुना तट,

आकर बैठ गई तब राधा।

छूकर चले पुरवाई सुहावन,

माधव प्रीत लगा मन साधा।

रात दिन भूल गए मुरली सुन,

श्याम रुको अब लागत बाधा।

मोहित हुए सब भूल गए सुध,

जीवन बीत गया फिर आधा।


विज्ञात मात्रिक छंद


 *1"विभव विज्ञात छ्न्द"* मात्रिक

चार चरण ,सम चरणान्त 21, विषम:212

 शिल्प:- मात्रा (१७-११)


कंचन मृग


सीता कहती हैं श्री राम से,मृग  है कंचन नाथ।

लेकर उसको प्रभु आ  जाइए,रखूँ मैं उसे साथ॥



 *2 विज्ञात विशाखा छंद* मांत्रिक

चार चरण 

17,17मात्रा सभी चरणान्त 212 


संकट 


सीते देखो यह छल है बड़ा, सत्य बात मेरी यह मान ले।

मायावी ने बदला रूप सुन,आए संकट गहरा जान ले॥



 *3 विज्ञात वैजयंती छंद* 

चार चरण

11,17

विषम चरनांत 21,समचरणांत 22 सम चरण का आरंभ त्रिकल से


हठ


हाथ उठाकर तीर,राम चले हठ मानकर सीता।

लक्ष्मण रहना साथ,नारी हठ से कौन है जीता॥


 *4 विज्ञात विटना छंद मांत्रिक* 


8 चरण चार पंक्ति 

प्रथम दो पंक्तियां 17,11 /17,11 शिल्प विभव विज्ञात 

द्वितीय दो पंक्तियां 11,17/11,17 विज्ञात वैजयंती के समान

चौथे चरण का सम तुकांत पाँचवें चरण की यति से पहले आना अनिवार्य ।


मायाजाल 


रावण ने माया से देख ली,खींची रेखा धूल।

उस रक्षा रेखा को पार कर,हुई सिया से भूल।

जाना रेखा का मूल,सिया फिर व्याकुल होकर रोती।

हिय में चुभते शूल,नयन से बैठ बहाती मोती॥


 *5 विज्ञात वियाली छंद* 


चरण 12,6पंक्तियाँ

प्रथम दो पंक्तियां 17,11 विभव विज्ञात समान।

तृतीय पंक्ति पहला चरण चौथे चरण का दोहराव तृतीय चौथी, पांचवी छठी पंक्ति 11,17 विज्ञात वैजंयती जैसे, अन्तिम शब्द छंद का पहला शब्द होना अनिवार्य।

छंद की शुरुआत चौकल से।


रघुवर की माया


बैठी सीता अशोक वाटिका,नाम जपे श्री राम।

राम पूछते खग मृग वृंद से,सीते है किस धाम।

सीते है किस धाम,विकल हो वन वन ढूँढे डोलें।

मिले कोई न भेद,वेदना गहरी नैना बोलें।

पाले जो यह दंभ, तूने छल से मुझे है पाया।

करने तेरा अंत,रघुवर ने रचाई है माया॥


 *6विज्ञात विरंचि छंद* 

चार चरण 

17,11/17,11

विषम चरण में पंद्रहवीं मात्रा लघु अनिवार्य 

विषम चरण में तुक मिलान

सम चरणान्त गाल(२१)से


सर्दी 


घोर कुहासा लेकर साथ में, सर्दी आई जोर।

कंबल ओढ़े सब यह सोचते, धूप खिले कल भोर॥



*7 विज्ञात शक्ति छंद* 

चार पंक्ति,आठ चरण, चारों अंत सम तुकांत 

8,10 विषय सम चरणान्त चौकल


सावन 


सावन आया, सबके मन चहके।

तप्त हुए तरु,लगते थे दहके।

खिलती कलियाँ,दे सुगंध महके।

भीगे तन-मन,यौवन भी बहके॥


 *8 विज्ञात योग छंद* 

10,8

दो पंक्तियां चार चरण

सम चरण सम तुकांत


बसंत 


चलती पुरवाई,बसंत आया।

नवपल्लव खिलते,सुगंध लाया।


 *9 विज्ञात योग शक्ति छंद* 

6 पंक्ति 12चरण

पहली दो पंक्तियां विज्ञात योग छंद जैसे 

फिर चार पंक्तियां विज्ञात शक्ति छंद जैसे

प्रत्येक चरण का अंत चौकल से

चौथे चरण की तुक बंदी पांचवें चरण में अनिवार्य 

प्रथम चरण चौकल हो, जिस शब्द से शुरू हो 12वां चरणान्त वहीं शब्द।


राधा की पीड़ा 


राधा की पीड़ा, किसने है जानी।

श्याम बिना अब,न पिए वो पानी 

कर मनमानी,क्यों मथुरा जाते।

साँझ सबेरे,अब न तुझे पाते।

तन यह खाली,प्राण गए लेके।

राधा रोए, गए विरह देके॥


 *10 विज्ञात सिद्धि छंद* 

10,8 /10,8

चौकल से शुरू प्रथम चौकल वाले शब्द से ही छंद का अंत। 

चौथे चरण से पांचवें चरण की तुक मिलान


श्याम विरह


हो मथुरा वासी, गोकुल भूले।

सूना वृंदावन,सूने झूले।

चुभती शूले,कहती है राधा।

लौट आओ न, क्यों इतनी बाधा॥




 *11 विज्ञात बेरी छंद* 

8,10/810

दो पंक्तियां चार चरण विषम चरण में तुक मिलाना।


नटखट कान्हा 


बैठी राधा, यमुना के तीरे।

बनकर बाधा,गोपी घेरे श्याम॥


बीते रैना,राह देख हारी।

व्याकुल नैना,पंथ निहार रहे॥


वंशी सुनकर , सुध-बुध मैं हारी।

मोती चुनकर,माला मैं बुनती॥


मटकी फोड़े,कर माखन चोरी।

बांहें मोड़े, कान्हा है नटखट॥

अनुराधा चौहान'सुधी'

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छंद सरिता

  अनुराधा चौहान'सुधी' 1. रमेश छंद   122 222 122 122 22 जपो श्री राधा राधा,रुलाए न कोई बाधा। मिटाती कष्टों को, हमारी किशोरी राधा॥ 2. ...