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आज जीने के लिए

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आज जीने के लिए, इक शिखण्डी चाहिए। काल को जो ग्रास ले, शक्ति चण्डी चाहिए।
प्रीत की मूरत बनी, पीती रही है गरल। अँधेरों में डूबती, रोती रहती अविरल। भस्म सारा दर्द हो, लौ अखण्डी चाहिए। काल को जो ग्रास ले, शक्ति चण्डी चाहिए।
आज जीने के लिए, इक शिखण्डी चाहिए।
खंड-खंड बिखरी सदा, दिखा न कोई रास्ता। पग-पग पे बबूल-थे, मार्ग कँटक से भरा। काट इन्हें फेंक दें, महा चण्डी चाहिए। काल को जो ग्रास ले, शक्ति चण्डी चाहिए।
आज जीने के लिए, इक शिखण्डी चाहिए।
दाँव पे हरदम लगी, लाज नारी की सदा। बैठे आँख मूँद के, भीष्म से सभी यहाँ। वार इन पे कर सके, वो शिखण्डी चाहिए। काल को जो ग्रास ले, शक्ति चण्डी चाहिए।
आज जीने के लिए, इक शिखण्डी चाहिए।
चीर हरण की पुकार, कौन सुनता है भला। आँख कान बंद करे, मौन कान्हा ने धरा। पाप को जो मार दे, वो त्रिखण्डी चाहिए। काल को जो ग्रास ले, शक्ति चण्डी चाहिए।
आज जीने के लिए, इक शिखण्डी चाहिए। *अनुराधा चौहान*
चित्र गूगल से साभार

आशा का दीपक (नवगीत)

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आशाओं के दीपक से भी, मन का अँधेरा दूर होता। मुश्किल से घबराकर कोई, यूँ कोई होश नहीं खोता।।
क्या रो-रोकर कभी किसी ने, सुख का जीवन जी पाया है। कभी नहीं सोचा जीवन में,  मिला कभी वो ही खोया है। आना-जाना खोना-पाना, हर काम समय से ही होता। मुश्किल से घबराकर कोई, यूँ कोई होश नहीं खोता।।
आशाओं के दीपक से भी, मन का अँधेरा दूर होता। मुश्किल से घबराकर कोई, यूँ कोई होश नहीं खोता।।
अच्छे कर्मों को सिंचित करके, मन के आँगन में बो लेना। बुराई को जड़ से मिटाकर, जीवन उजियारा कर लेना। बैठे-बैठे कभी न होगा, श्रम से ही सब संभव होता। मुश्किल से घबराकर कोई, यूँ कोई होश नहीं खोता।।
आशाओं के दीपक से भी, मन का अँधेरा दूर होता। मुश्किल से घबराकर कोई, यूँ कोई होश नहीं खोता।।
***अनुराधा चौहान*** चित्र गूगल से साभार

ममता का सागर(चौपाई)

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ममता का सागर है गहरा, बच्चों पर रखती है पहरा। संकट कोई पास न आता, सबसे लड़ जाती है माता।१।
धीर,गंभीर,कोमल मन की खुशियाँ देती वो बचपन की। सच्चाई का पाठ पढ़ाती, अच्छी बुरी बात बतलाती।२।
माँ के आगे झुकता माथा, त्याग भरी यह सच्ची गाथा। माँ सरिता सी बहती धारा, डूबा जिसमें जीवन सारा।३।
आँखों में करुणा का सागर, भरो ज्ञान से अपनी गागर। माँ से कोई पार न पाता,
माँ भविष्य की है निर्माता।४। *अनुराधा चौहान स्वरचित ✍️*
चित्र गूगल से साभार

कोई जहर न उगले

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लता लता को खाना चाहे
कहीं कली को निगले
शिक्षा के उत्तम स्वर फूटे
जो रागों को निगले

अविरल धारा बहे सदा ही
साथ ज्ञान को लेकर
भावों के सुंदर बहते हैं
झरने अनुभव देकर
मीठी वाणी रखो सदा ही
कोई जहर न उगले
शिक्षा के उत्तम स्वर फूटे
जो रागों को निगले

लता लता को खाना चाहे
कहीं कली को निगले
शिक्षा के उत्तम स्वर फूटे
जो रागों को निगले

पतझड़ में शाखों पे खिलती
नव पल्लव हरियाली,
मन में कभी न बुझने देना
दीप सदा खुशियाली।
हृदय में प्रेम की ज्वाला से
अँधियारा भी पिघले।
शिक्षा के उत्तम स्वर फूटे
जो रागों को निगले

लता लता को खाना चाहे
कहीं कली को निगले
शिक्षा के उत्तम स्वर फूटे
जो रागों को निगले ***अनुराधा चौहान*** चित्र गूगल से साभार

शिव नीलकंठ

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शिव नीलकंठ शिव महाकाल, त्रिनेत्र लाल शिव है विकराल। लिपटाए बाघाम्बर अंग, भूत गणादि चले संग संग।
शिव शंभू शंकर कैलाशी, शिव शंभू जय जय अविनाशी। भालचंद्र तन भस्म लपेटे, नीलकंठ दें दुष्ट झपेटे। छवि सुंदर है ललाट विशाल, शिव नीलकंठ शिव महाकाल।।
कर त्रिशूल डम डमरू बाजे, भोले शिव कैलाश विराजे। गौरी निशदिन करती पूजा, शिवशंकर-सा देव न दूजा। शिव से शान्ति शिव ही भूचाल, शिव नीलकंठ शिव महाकाल।
आदि अंत अनंत शिव शंकर, शिव महाकाल शिव प्रलयंकर। जय-जय जय जय शिव ओंकारा, जटा धरी शीश गंग धारा। दानव दल करें हाहाकार, शिव नीलकंठ शिव महाकाल।।
***अनुराधा चौहान*** स्वरचित ✍️©️
चित्र गूगल से साभार

भोर नवेली

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आई सुंदर भोर नवेली, निकली घर से सखी-सहेली। सूरज सिर पर लगा चमकने, सरोवर में कमल दल हँसने।।
खिल आई पूरब में लाली, कलियाँ खिलती डाली डाली। चली बसंती हवा हर प्रहर, सुखद अनुभूति से भरी लहर।।
सजी अलौकिक सुंदर आभा, अंशु फैलाए जग में प्रभा। मृदु माली बन जीवन सेता, धरती पे यह जीवन देता ।।
सुबह-सवेरे उठकर आता, जग में उजियारा फैलाता। भरे लालिमा निखरती भोर, पक्षी कलरव का हुआ शोर।।
***अनुराधा चौहान*** चित्र गूगल से साभार

नफ़रत

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दिशाएँ कह रही हमसे, हवाओं में न विष घोलो। उजाड़े यह चमन हमने,दिलों के द्वार तुम खोलो।।
सुलगती नफरतें दिल में,यही कड़वी हकीकत है। लड़ाई मजहबी लड़ते,करी अपनी फजीहत है।।
नशा झूठ सिर का चढ़ता,करें सबको परेशानी। अहं सिर पर चढ़ा बैठा,करें बिन बात मनमानी।।
 दिल के अंदर कड़वाहट,भुलाकर प्यार की बातें। उड़ा प्रेम धुआँ बन कहाँ,जले दिन भी जलें रातें।।
चुनी ग़लत सबने राहें,सभी कर्म पथ भी छोड़े। अपनापन सबने भूला,दिल से बंधन भी तोड़े।।
***अनुराधा चौहान***✍️ विधाता छंद विधान* १२२२,१२२२,१२२२,१२२२ = २८ मात्रा १,७,१५,२२वीं मात्रा लघु अनिवार्य
चित्र गूगल से साभार