Monday, July 4, 2022

जीवन नैया


  
भवसागर में डोलती,जीवन की जब नाव।
अंत किनारे कब लगे,मन में उठते भाव॥

पार लगाओ कष्ट से,जीवन हो निष्काम।
माँगो प्रभु से आसरा,ले चल अपने धाम॥

नौका लालच बोझ से,हो जब डांवाडोल।
पार लगाएंगे प्रभो,मन से श्री हरि बोल॥

बहती सरिता बैर की,दुःख करता विनाश।
बीच भँवर नैया फँसी,लिपटी छल के पाश॥

हाड़ माँस की कोठरी,मन करता जब शोर।
लिपटा मायाजाल में,मानव ढूँढे भोर॥
©® अनुराधा चौहान'सुधी'
चित्र गूगल से साभार 

श्रेष्ठ प्राकृतिक बिम्ब यह (दोहे)

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