Monday, December 13, 2021

सुख मिलन का


 सामने श्री रघुनाथ है,
नयन सबके भीगते।
सीने लगा प्रभु भरत को,
अश्रु से फिर सींचते ।

शत्रुघ्न व्याकुल हुए फिर,
दौड़ चरणों में गिरे।
भाई लखन के नयन से, 
अश्रु की धारा झरे। 
सुख मिलन ऐसा बढ़ा फिर, 
अंक भरकर भींचते।सीने लगा प्रभु...

प्रेम की बारिश बरसती,
देख धरती झूमती।
महकती पुरवा चली फिर,
चरण प्रभु के चूमती।
स्वप्न तो यह मेरा नहीं,
नयन फिर सब मींजते।सीने लगा प्रभु...

शब्द सारे मौन होते,
देख यह सुंदर घड़ी।
मात के नयना छलकते,
लिए ममता की झड़ी।
प्रीत का यह रंग पक्का,
देख सब फिर रीझते। सीने लगा प्रभु...

*अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित*
चित्र गूगल से साभार

16 comments:

  1. वाह!बहुत ही सुंदर सृजन।
    सादर

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  2. अत्यंत सुन्दर सृजन ।

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  3. बहुत सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।

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    1. हार्दिक आभार आदरणीया।

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  4. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार(१७-१२ -२०२१) को
    'शब्द सारे मौन होते'(चर्चा अंक-४२८१)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  5. Replies
    1. हार्दिक शुभकामनाएं आदरणीया।

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  6. Replies
    1. हार्दिक आभार विकास जी।

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  7. बहुत ही सुंदर वर्णन सखी।
    सुंदर सृजन।

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  8. वाह!!!
    बहुत ही हृदयस्पर्शी लाजवाब सृजन।

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