Friday, April 29, 2022

मुश्किल जीना


 गर्म हवा जब भी लहराए।
धरती की तब तपन बढ़ाए॥
पत्थर वन की ऐसी माया।
ढूँढ़ने पर भी मिले छाया॥

रोको कटने से वन सारे।
वरना मानव जीवन हारे॥
सूखें नदियाँ ताल तलैया।
जल बिन जीवन चले न भैया॥

चटक रहा धरती का सीना।
भीषण गर्मी मुश्किल जीना॥
हर दिन पारा चढ़ता जाए।
व्याकुल मन जीवन घबराए॥

मस्ती में जब लू लहराती।
कोमल काया झुलसी जाती॥
धूप देख तब आए रोना।
ढूँढे हर कोई शीतल कोना॥

कानन मिटकर होते खाली।
काट रहे सब मिल हरियाली॥
कड़ी धूप तन को झुलझाए‌।
भीषण गर्मी आज रुलाए॥

©® अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित
चित्र गूगल से साभार

Thursday, April 28, 2022

उन्नति के शिखर


  
उन्नति के चढ़कर शिखर,प्रीत न जाना भूल।
प्रीत बिना चढ़ती सदा,रिश्तों पर फिर धूल।
रिश्तों पर फिर धूल,चिढ़ाए पल पल मन को।
अपनों के ही संग,मिले हर सुख जीवन को।
देख स्वार्थ के पथ,मिले पग पग पर अवनति।
सच का आँचल थाम, शिखर चढते सब उन्नति।
अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित
चित्र गूगल से साभार

श्रेष्ठ प्राकृतिक बिम्ब यह (दोहे)

1-अग्नि अग्नि जलाए पेट की,करे मनुज तब कर्म। अंत भस्म हो अग्नि में,मिट जाता तन चर्म॥ 2-जल बिन जल के जीवन नहीं,नर तड़पे यूँ मीन। जल उपयोगी मान...