Friday, July 10, 2020

सोरठा-भाग-1

1
कैसा यह संसार,बेटी लगती बोझ सी।
हलका करते भार, टुकड़े करके कोख में।।
2
रचा महावर लाल,बेंदा चमके माथ पे।
आज चली  ससुराल,घर बाबुल का छोड़ के।।
3
बेटी माँगे प्रीत,सिमटी आँचल मात के ।
कैसी जग की रीत,मारी निर्बल बालिका।।
4
वचन बड़े अनमोल,मीठी वाणी बोलिए।
विष जीवन मत घोल,मर जाते नाते सभी।।
5
कैसा कलयुग राज,भूली कोयल कूक भी।
गोलमाल सब काज,धूमिल होती धूप भी।।
6
आज धरा की पीर,तपती धरती से बढ़ी।
घन बरसाओ नीर,मेघों की छाया करो।।
7
जल की कीमत जान,कहती है पल-पल धरा।
बूँद सोम सम मान,जीवन जीने के लिए।।
8
संयम से ले काम,उलटी धारा समय की।
जपो राम का नाम,मन के सारे डर मिटे।।
9
मचता हाहाहार,कोरोना के रोग से।
पड़ी समय की मार,मानव डरता देख के।।
10
नहीं देखती काम,जनता चुनती नाम को।
भुगते तगड़ा दाम,अर्थी वचनों की उठी।।

***अनुराधा चौहान'सुधी'***

4 comments:

  1. बहुत बढ़िया सोरठा
    बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ

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  2. अच्छे सोरठे।
    बात तो एक ही है, दोहा या लिखो या सोरठा।

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